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हजारों विद्यार्थियों का प्रदर्शन प्रभावित, निष्पक्ष मूल्यांकन हेतु प्रधान पाठक ने मांगा मार्गदर्शन

सूरजपुर – कक्षा चौथी की वार्षिक परीक्षा 2026 के हिन्दी विषय के प्रश्नपत्र में गंभीर त्रुटि सामने आई है, जिससे न केवल प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था, प्रश्नपत्र निर्माण प्रक्रिया और मूल्यांकन की पारदर्शिता पर सवाल खड़े हुए हैं, बल्कि हजारों विद्यार्थियों के भविष्य को लेकर भी असमंजस की स्थिति बन गई है।

जिले के शासकीय प्राथमिक शाला चट्टीडांड़ के प्रधान पाठक गौतम शर्मा ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए जिला शिक्षा अधिकारी, सूरजपुर को पत्र प्रेषित कर त्वरित एवं स्पष्ट मार्गदर्शन की मांग की है। प्रधान पाठक गौतम शर्मा ने बताया कि 30 मार्च 2026 को आयोजित हिन्दी विषय की परीक्षा में कुल 7 अंकों के 3 प्रश्न ऐसे पूछे गए, जो निर्धारित पाठ्यक्रम एवं स्वीकृत पाठ्य-पुस्तकों से बाहर के थे। ये प्रश्न छत्तीसगढ़ के मैदानी क्षेत्रों के लिए निर्धारित छत्तीसगढ़ी भाषा के पाठों से संबंधित थे, जबकि सूरजपुर जिला सरगुजा क्षेत्र में आता है, जहाँ विद्यार्थियों के लिए सरगुजिहा स्थानीय भाषा पर आधारित भिन्न पाठ्यक्रम लागू है।

प्रधान पाठक ने अपने पत्र में स्पष्ट किया है कि इस स्थिति में संबंधित 7 अंकों का मूल्यांकन किस प्रकार किया जाए, इस पर दिशा-निर्देश आवश्यक है। उन्होंने यह भी सुझाव मांगा है कि क्या सभी विद्यार्थियों को अनुग्रह अंक प्रदान किए जाएं अथवा किसी वैकल्पिक मूल्यांकन पद्धति को अपनाया जाए। साथ ही भविष्य में प्रश्नपत्र निर्माण के दौरान क्षेत्रवार पाठ्यक्रम की शुद्धता सुनिश्चित करने हेतु सख्त निर्देश जारी करने की भी मांग की गई है।

पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अंतर्गत प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा एवं स्थानीय भाषा आधारित शिक्षण को विशेष प्राथमिकता दी गई है। ऐसे में क्षेत्र विशेष के पाठ्यक्रम की अनदेखी कर प्रश्न पूछना न केवल प्रशासनिक त्रुटि है, बल्कि नीति की मूल भावना के भी विपरीत है। गौरतलब है कि संबंधित प्रश्नपत्र राज्य स्तर से रायपुर से एकसाथ वितरित किया गया था, जिससे यह आशंका जताई जा रही है कि यह त्रुटि अन्य जिलों को भी प्रभावित कर सकती है। परीक्षा के दौरान इस विसंगति के कारण विद्यार्थियों में भ्रम, असमंजस और मानसिक दबाव की स्थिति उत्पन्न हुई, जिसका सीधा असर उनके उत्तर लेखन पर पड़ा।

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार की त्रुटियाँ विद्यार्थियों के शैक्षणिक प्रदर्शन के साथ-साथ संपूर्ण परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता को भी प्रभावित करती हैं। ऐसे में आवश्यक है कि संबंधित प्रकरण में त्वरित, पारदर्शी और न्यायसंगत निर्णय लिया जाए, ताकि विद्यार्थियों के हितों की रक्षा सुनिश्चित की जा सके।

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